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#भूल_गए_होगें_याद_दिला_दूँ_अपना_इतिहास

'भारत' का नाम यह संविधानिक नाम है "भारत - That is India" सांस्कृतिक नाम नहीं। प्राचीन भारत का सांस्कृतिक नाम था- #जम्बू द्वीप, #वानरंसा द्वीप, #कोया कोया तुरे, #सिंगार द्वीप तथा #गोंडवाना लैण्ड । 

#प्राचीन भारत बहुत ही समृद्ध और उच्च कोटी की सभ्यता थी, जिसे *सिन्धुघाटी/द्राविड़/River Valley सभ्यता* की नाम से इतिहास में लिपिबद्ध है। इस सभ्यता के निर्माता भारत के मूलनिवासी *द्राविड़* थे जिनके वंशज आज भारत में SC/ST/OBC/R.Minority के रूप में है। समृद्ध गोंडवाना लैंण्ड को विदेशी  आक्रमणकारियों ने नष्ट करके आज विश्व में सबसे पीछे ढकेल दिया।
 
*#भारत पर 12 बार विदेशी आक्रमण हुए :-*
1. यूरेशियायी आर्य ब्राह्मण 
2. मीर काशीम 712 ईस्वी 
3. महमूद गजनवी 
4. मोहम्मद गोरी 
5. चंगेज खान 
6. कुतुबुद्दीन ऐबक 
7. गुलाम वंश 
8. तुगलक वंश
9. खिलजी वंश
10. लोदी वंश
11. मुगल वंश
12. अंग्रेज (British)
#सबसे पहला विदेशी आक्रमणकारी आर्य ब्राह्मणों (अर्थवा, रथाईस्ट, वास्तानिया) ने यहाँ आक्रमण कर साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना कर यहाँ की समृद्ध सभ्यता को छिन्न-भिन्न किया। अकूत संपत्ति को लूटने का काम किया देशी नरेशों से हजारों साल लड़ाई होती रही इसी लड़ाई को वेदों में सुर-असुर ; देव-दानव ; देवता-राक्षस के नामो से जाना जाता है। आर्य अपने को देवता/सुर तथा मूलनिवासी द्राविड़ों को असुर/राक्षस की संज्ञा देकर वेदों में Hero को Velion और Velion को Hero बनाया। वेदों के अनुसार यज्ञों में भारी संख्या में पशुवली, गौवली की परंपरा थी दुराचार, कुसंस्कार, अमानवीय परंपरा थी जो आर्यों की संस्कृति कही जाती है। ब्राह्मणधर्म और वेद की नीतियों से मूलनिवासी पूर्ण रूप से उब चुके थे।

#तथागत_बुद्ध_की_धम्मक्रांति_एवं_सम्राट_अशोक*
 तथागत बुद्ध ने जब वेद और ब्राह्मणधर्म के विरोध में एक नया मानवता मार्ग #धम्म स्थापना की तो लोग #बौद्धधम्म अपनाने लगे। उस समय बड़े बड़े बौद्ध सम्राटों का उदय हुआ। अशोक से पहले ब्राह्मणों ने हजारों गौवंश का कत्ल यज्ञ के नाम से करते थे जो किसानो के लिए चिंता का विषय था। ब्राह्मण गौमांस का कारोवार भी करते थे जिसे घटती गौवंश को रोकने के लिए सम्राट अशोक ने अपने राज्य में पशु हत्या पर पाबन्दी लगा दी थी, जिसके कारण ब्राह्मणों की रोजगार योजना बंद हो गई थी, उसके बाद सम्राट अशोक ने शिकायत मिलने पर  तीसरी धम्म संगति में ६०,००० ब्राह्मणों को बुद्ध धम्म भिखु संघ से निकाल बाहर किया था, तो ब्राह्मण १४० सालों तक पाखंडवाद न चला पाने के कारण गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को मजबूर हो गये थे, उस वक़्त ब्राह्मण आर्थिक दुर्बल घटक बनके जी रहे थे, ब्राह्मणों का वर्चस्व और उनकी असमानता पर आधारित गैर बराबरी की परंपरा खत्म हो गई थी, उसे वापस लाने के लिए ब्राह्मणों के पास बौद्ध धम्म के राज्य के विरोध में -षढयन्त्र युक्त छलकपट पूर्ण युद्ध करना यही एक मात्र विकल्प रह गया था, तब ब्राह्मणों ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस लाने के लिए गद्दारी और हिंसा का मार्ग चुना ...

#अखण्ड भारत में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में अखण्ड भारत के निर्माता चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक महान के पौत्र, मौर्य वंश के 10 वें न्यायप्रिय सम्राट राजा बृहद्रथ मौर्य  की हत्या धोखे से उन्हीं के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की उसके नेतृत्व में ईसा पूर्व १८५ में रक्त रंजिस साजिश के तहत प्रतिक्रांति की और खुद को मगध का राजा घोषित कर लिया था। और इस प्रकार छल कपट पूर्ण हिंसा से बौद्ध भारत में ब्राह्मणशाही की स्थापना गद्दार पुश्यमित्र शुन्ग द्वारा हुयी गद्दार पुश्यमित्र शुंन्ग राजा बनने पर राजशक्ति के दम पर पाटलिपुत्र से स्यालकोट तक सभी बौद्ध विहारों को ध्वस्त करवा दिया व बौद्ध साहित्य को जला दिया था, तथा अनेक बौद्ध भिक्षुओ का खुलेआम कत्लेआम किया था। पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों व यहाँ की जनता पर बहुत अत्याचार करता था. उसी ने मनुस्मृति की रचना करवाई और राजसत्ता की ताकत के बल पर ब्राह्मणों द्वारा रचित मनुस्मृति के अनुसार वर्ण व्यवस्था के कानून का राज चलाया करता था।

#उत्तर-पश्चिम क्षेत्र पर उस वक्त यूनानी राजा मिलिंद का अधिकार था। राजा मिलिंद बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। जैसे ही राजा मिलिंद को पता चला कि पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों पर अत्याचार कर रहा है तो उसने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। पाटलिपुत्र की जनता ने भी पुष्यमित्र शुंग के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर दिया, इसके बाद पुष्यमित्र शुंग जान बचाकर भागा और उज्जैनी में जैन धर्म के अनुयायियों की शरण ली।

#जैसे ही इस घटना के बारे में कलिंग के राजा खारवेल को पता चला तो उसने अपनी स्वतंत्रता घोषित करके पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। पाटलिपुत्र से यूनानी राजा मिलिंद को उत्तर पश्चिम की ओर धकेल दिया।

#इसके बाद ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग (जिसे इसके दरबारी राज कवि वाल्मीकि ने राम के नाम से प्रचारित किया) ने अपने समर्थको के साथ मिलकर पाटलिपुत्र और श्यालकोट के मध्य क्षेत्र पर अधिकार किया और अपनी राजधानी उस समय की विश्व प्रसिद्ध बौद्ध नगरी साकेत को बनाया। पुष्यमित्र शुंग ने बाद में इसका नाम बदलकर अयोध्या कर दिया। अयोध्या अर्थात-बिना युद्ध के बनायीं गयी राजधानी...

#राजधानी बनाने के बाद पुष्यमित्र शुंग उर्फ राम ने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति, बौद्ध भिक्षुओं का सर (सिर) काट कर लायेगा उसे 100 सोने की मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी। इस तरह सोने के सिक्कों के लालच में पूरे देश में बौद्ध भिक्षुओ  का कत्लेआम हुआ।  राजधानी में बौद्ध भिक्षुओ के सर इनाम पाने के लिए आने लगे । इसके बाद कुछ चालाक व्यक्ति अपने लाये सर को चुरा लेते थे और उस सर को दुबारा राजा को दिखाकर स्वर्ण मुद्राए ले लेते थे। राजा को पता चला कि लोग ऐसा धोखा भी कर रहे है तो राजा ने एक बड़ा पत्थर रखवाया और राजा, बौद्ध भिक्षु का सर देखकर उसे उस पत्थर पर मरवाकर उसका चेहरा बिगाड़ देता था । इसके बाद बौद्ध भिक्षु के सर को घाघरा नदी में फेंकवा देता था। राजधानी अयोध्या में बौद्ध भिक्षुओ  के इतने सर आ गये कि कटे हुये सरों से नदी पूर्तया पट गयी और उसका नाम सरयुक्त अर्थात वर्तमान में अपभ्रंश "सरयू" हो गया।

#इसी "सरयू" नदी के तट पर पुष्यमित्र शुंग के दरबार मे ब्राहम्ण राजकवि वाल्मीकि ने "रामायण" लिखी थी। जिसमें राम के रूप में पुष्यमित्र शुंग को और "रावण" के रूप में मौर्य सम्राटों का वर्णन करते हुए उसकी राजधानी अयोध्या का गुणगान किया था और राजा से बहुत अधिक पुरस्कार पाया था। इतना ही नहीं, इसी काल मे वाल्मीकि रामायण, महाभारत,पुराणो व स्मृतियां आदि बहुत से काल्पनिक ब्राह्मण धर्मग्रन्थों की रचना भी पुष्यमित्र शुंग की इसी अयोध्या में "सरयू" नदी के किनारे हुई।

#बौद्ध भिक्षुओं के कत्लेआम के कारण सारे बौद्ध विहार खाली हो गए, तब आर्य ब्राह्मणों ने सोचा कि इन बौद्ध विहारों का क्या करें कि आने वाली पीढ़ियों को कभी पता ही नहीं लगे कि इतिहास मे बीते वर्षो में यहाँ क्या हुआ और यह क्या थे? 

#तब उन्होंने इन सब बौद्ध विहारों को मन्दिरो में बदल दिया और इसमे अपने पूर्वजो व काल्पनिक पात्रों,  देवी देवताओं को वहां पहले से ही स्थापित बौद्ध मूर्तियो को भगवान बताकर स्थापित कर दिया और पूजा पाखण्ड के नाम पर यह मंदिर रूपी दुकानें खोल दी। 

#साथियों, इसके बाद ब्राह्मणों ने मूलनिवासियो (बौद्ध धम्मियो) को बौद्ध विहारों से convert किये गये मन्दिरों मे प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया ताकि वे इस घटना को याद न रख पाये और इतना ही नहीं मूलनिवासियों बौद्ध धम्मियो से बदला लेने के लिए षडयन्त्र पूर्वक  राजसत्ता की ताकत से वर्ण-व्यवस्था का convertion जाति व्यवस्था मे कर दिया गया, यानी class का conversion cast में कर दिया गया और जाति व्यवस्था के तहत, जाति व्यवस्था में ६००० से भी अधिक जातियाँ बनाईं और उसमें ७२००० उप जातियाँ बनाई। इसे ब्राह्मणों ने इश्वर निर्मित बता कर प्रचारित किया ताकि इसे थोपने पर मूलनिवासी (बौद्ध) सहजता से स्वीकार कर लें, मूलनिवासियों को इतने छोटे-छोटे हजारों जातियों के टुकड़ो में बाँटा ताकि मूलनिवासी संगठित होकर ब्राह्मणों से फिर कभी विद्रोह न कर सकें उनसे युद्ध न कर सके और ब्राह्मणों पर फिर से विजय प्राप्त न कर सके।

#ध्यान रहे उक्त बृहद्रथ मौर्य की हत्या से पूर्व भारत में मन्दिर शब्द ही नही था, ना ही इस तरह की कोई संस्कृति थी वर्तमान में ब्राह्मण धर्म में पत्थर पर मारकर नारियल फोड़ने की परंपरा है ये परम्परा पुष्यमित्र शुंग के बौद्ध भिक्षु के सर को पत्थर पर मारने का प्रतीक है।

#पेरियार रामास्वामी नायकर ने True Ramayan यानी " सच्ची रामायण" नामक पुस्तक लिखी जिसका उत्तर प्रदेश मे पेरियार ललई सिंह यादव ने हिन्दी में अनुवाद किया जिस पर उ.प्र. govt ने प्रतिबन्ध लगा दिया और तब मामला इलाहबाद हाई कोर्ट मे चला गया और केस नम्बर 412/1970 में वर्ष 1970-1971 व् सुप्रीम कोर्ट 1971 -1976 के बीच में केस अपील नम्बर 291/1971 चला ।

#जिसमे सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस पी एन भगवती जस्टिस वी आर कृष्णा अय्यर, जस्टिस मुतजा फाजिल अली ने दिनाक 16.9.1976 को निर्णय दिया कि सच्ची रामायण पुस्तक सही है और इसके सारे तथ्य सही है। सच्ची रामायण पुस्तक यह सिद्ध करती है कि "रामायण" नामक देश में जितने भी ग्रन्थ है वे सभी काल्पनिक हैं और इनका पुरातात्विक व ऐतिहासिक कोई आधार नही है। अथार्त् 100% फर्जी व काल्पनिक है। एक ऐतिहासिक सत्य जो किसी किसी को पता नहीं है कि बौद्ध जातक कथाओ में मिलावट कर ब्राहम्णों ने रामायण व अन्य धर्म ग्रंथ लिखे और बौद्ध साहित्य का ब्राहम्णीकरण किया लोगों को शिक्षा लेने का अधिकार कानून बना कर रोका ताकि लोग वास्तविक षढयन्त्र से अनभिज्ञ रहें और जो ब्राहम्णो द्वारा बताया जा रहा है उसे ही सच मानें, विदेशी ब्राहम्णों के इन षढयन्त्रो ने भारत के मूलनिवासियो को मनुवादी/ब्राहम्ण वादी के अमानवीयता पूर्ण कानूनों से अपमानित व अधिकार विहीन गुलाम बना दिया और देश बाद में बाहर से आक्रमण कारी ताकतो का गुलाम हो गया. 

#भारत के बहुजनों, अपने मूल इतिहास को जानो, पाखण्डी ब्राह्मणवादियों के बहकावे में न आयें। अन्यथा वो दिन फिर लौट सकते हैं जब हमें पानी पीने, तन पे कपड़ा पहनने, पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं था, हमे जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने पर मनुवादी मजबूर किया करते थे,आज आजाद भारत में मूलनिवासियो की मूर्खता के चलते ऐसा दिन आने में फिर देर नहीं है ध्यान रखना ऐसी दुर्दशा से हम को बचाने के लिए कोई दूसरे बाबासाहेब अब नहीं आयेंगें।

#आज जिन मूलनिवासी लोगों ने सवर्णं के साथ मिलकर हिन्दुराष्ट्र उर्फ रामराज्य का सपना देख रहे हैं। जय श्रीराम नाम से मरने मारने को उतरे हैं उनको अपना इतिहास मालूम नहीं कि वे किनको आमंत्रित कर रहे हैं," आ बैल मुझे मार"। ब्राह्मण हिन्दुराष्ट्र के नाम से अंधभक्तों को बेवकूफ बनाकर अपना ब्राह्मणधर्म व ब्राह्मणराष्ट्र बनाने में लगी है। अंधभक्त बने मूलनिवासियों को यह अच्छी तरह समझने की जरूरत है।

जागरूक रहें, लोगों को जागरूक करें!

🙏जोहार जय मूलनिवासी !!

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